पुलिस के पास जाना
क्रिमिनल तरीका
जब आप क्रिमिनल केस फ़ाइल करने का निर्णय लेती हैं, तो यह ज़रुरी है कि आप पुलिस के पास जाने के पहले अपनी तैयारी कर लें.
- क्रिमिनल प्रोसिजर की शुरुआत एफ आई आर दर्ज कराने से होती है. यह एफ आई आर ही है जिसे पीड़ित क़ानूनी न्याय के लिए अपने अहम सबूत के रूप में देती है. एफ आई आर दर्ज कराने के पहले यह भी जानना जरुरी है कि कोग्निजीबल और नॉन-कोग्निनिबल अपराध के बीच क्या फर्क है. यौन उत्पीडन एक कोग्निजीबल अपराध है.
- एक बार जब एफ आई आर दर्ज हो जाता है, तब एक जांच अधिकारी को मामले के तहकीकात के लिए अपोइंट किया जाता है. इस जांच के आधार पर, पुलिस यह तय करती है कि आरोपी को गिरफ्तार किया जाए या नहीं. जांच के पूरा होने के बाद, पुलिस को चार्ज शीट तैयार करनी होती है जिसे मजिस्ट्रेट के पास जमा दिया जाता है.
- इसके बाद केस को कोर्ट में प्रस्तुत किया जाता है, इसके बाद या तो आरोपी को कारावास (कोग्निजीबल अपराध) भेजा जाता है या तो अपराध (नॉन-कोग्निजीबल) की आगे तहकीकात के लिए पुलिस इजाजत लेती है.
- कोर्ट के द्वारा आरोप को फ्रेम किया जाता है, जहाँ आरोपी को इस बारे में बताया जाता है और अपना पक्ष लेने के लिए कहा जाता है (कि वो अपराधी है या नहीं)
- दोनों पक्षों के गवाह और सबूत की फिर से जांच होती है
- दोनों पक्षों की तरफ से बहस सामने रखे जाते हैं
- अंत में फैसला सुनाया जाता है जिसके आधार पर आरोपी को या तो सज़ा होती है या रिहाई मिलती है.
पुलिस द्वारा तुरंत की कार्यवाई
यदि आप किसी ऐसी परिस्थिति में फंस गए हों जहाँ आपको तुरंत पुलिस के मदद की जरुरत हो, तब 100 नंबर पर फोन करने से ना झिझकें. इस बारे में और पढ़ें………
जब तक लोकल पुलिस आपकी सहायता को नहीं पहुँचती तब तक पुलिस कंट्रोल से आपको सहयोग मिल सकता है. यदि आप दिल्ली या मुंबई में हैं, तो महिलाओं के लिए हेल्पलाईन नंबर 1091 या 103 का इस्तेमाल कर सकते हैं.
कुछ केसों में उत्पीडक भाग निकलने की कोशिश कर सकता है. इस तरह के केसों में, जब तक पुलिस नहीं आ जाती आप अपने आसपास के लोगों की सहायता ले सकते हैं कि वे अपराधी को पकडवाने में आपकी मदद करें. यह सेक्शन 43 क्रिमिनल प्रोसिजर कोड के अंतर्गत संभव है जो नागरिकों को ऐसी गिरफ़्तारी में मदद के लिए प्रोत्साहित करता है.
एफ आई आर दर्ज करना
यौन उत्पीडन बंद करने के लिए इसकी पहचान करना जरुरी है. यहाँ हमेशा ऐसे लोग होंगें जो हमेशा कहेंगें कि इसका कोई मतलब नहीं है और आप कुछ ज्यादा ही उतेजित हो रही हैं. कुछ के लिए हो सकता है कि यह ‘टाइम-पास’ हो, लेकिन एफ आई आर दर्ज करवा कर आप उन्हें बताती हैं कि यह एक अपराध है.
एफ आई आर दर्ज कराने के लिए निम्नलिखित बातें ध्यान में रखनी चाहिए……..
- एफ आई आर हमेशा पुलिस स्टेशन में ही दर्ज की जाती है. हालांकि, यह जरुरी नहीं कि पीड़िता खुद ही दर्ज कराये. यह गवाह या उस पुलिस अधिकारी द्वारा भी दर्ज किया जा सकता है जिनके सामने अपराध हुआ हो.
- एफ आई आर दर्ज कराने में बहुत देर नहीं करनी चाहिए. देरी होने से अनावश्यक क़ानूनी प्रक्रिया में रुकावट आ सकती है.
- एफ आई आर में यौन उत्पीडन होने का समय, तारीख सारा विवरण होना चाहिए. आरोपी की पहचान और यदि किसी ने उसकी मदद की हो तो उसके बारे में विवरण देना चाहिए. यदि उत्पीडक कोई अज्नाबी था, तब जितना याद हो उसके बारे में जानकारी देनी चाहिए.
- आप घटना के बारे में जितनी सही जानकारी दे सकते हैं उतनी दें. उदाहरण के लिए, आपको उत्पीडक ने घूर, पकड़ा और ये सब कैसे और कब हुआ.
- यदि आपकी सुरक्षा को उत्पीडक से किसी भी तरह का खतरा हो, उसे एफ आई आर में बताएं.
- जहाँ यौन उत्पीडन हुआ हो उसी इलाके में एफ आई आर दर्ज होनी चाहिए. इसलिए यदि आपके साथ आपके घर या उत्पीडक के घर में यौन उत्पीडन हुआ हो, तो आप उसी इलाके के पुलिस स्टेशन में केस दर्ज करना चाहिए.
- साइन करने के पहले जो एफ आई आर लिखा है उसे अच्छी तरह से पढ़ लें.
- पुलिस स्टेशन में ड्यूटी ऑफिसर से एफ आई आर में स्टाम्प और साइन लेना चाहिए. रिपोर्ट का सीरियल नंबर नोट कर लें.
- आपको मुफ्त में एफ आई आर की एक कॉपी मिलनी चाहिए.
- जब आप एफ आई आर फ़ाइल करती हैं तो याद रखें कि आप वही सच्चाइयाँ रिपोर्ट में दर्ज करती हैं जो आप जानती हैं. इसे साबित करने की जिम्मेदारी आपकी नहीं हैं.


