क़ानूनी कदम उठाना
अभी तक भारत में यौन उत्पीडन का लिए कोई कानून नहीं है. इसमें कोई शक नहीं कि मौजूदा कानून को तोडमरोड कर इस्तेमाल किया जाता है. हालांकि, इन्हीं मौजूदा कानून को लेकर हमें आगे चलना है.
इस प्रक्रिया में यह महत्वपूर्ण है कि आप अपने अधकार को जानें. एक जागरूक महिला के पास सिस्टम से लड़ने के लिए बेहतर चुनाव है.
कानून के इस्तेमाल के विकल्प को लेकर चलने के पहले इसकी कमियों और समस्याओं के बारे में भी जान लें.
यौन उत्पीडन के कानून ‘शील भंग’, ‘परेशान’ करने या ‘अश्लीलता’ के आधार पर बने हैं, जिन्हें परिभाषित करना और इसलिए इस्तेमाल करना मुश्किल है.
पूरी क्रिमिनल प्रक्रिया लंबी और पेचीदी है. एक निश्चित समय के बाद ही केस कोर्ट तक पहुँचते हैं, और जब पहुँचते हैं तो पूरी प्रक्रिया उतनी असरदार नहीं रहती. इसकी कुछ खास कमियां जो नीचे दी गई हैं उनके बारे में जानना जरुरी है.
- बड़े पैमाने पर साबित करने कि ज़िम्मेदारी महिलाओं पर ही है. उसे ना केवल यह साबित करना है कि उसके पास शीलता और नैतिकता है बल्कि यह भी साबित करना होगा कि उत्पीडक ने अपने व्यवहार से इस शीलता का हनन किया है.
- पीड़िता को यह भी साबित करना होगा कि उत्पीडक का व्यवहार यौनिक था. कानून में पुरातनपंथी शब्दों का भरमार है.
यौन उत्पीडन के लिए सुप्रीम कोर्ट की मार्गदर्शिका
महिला समूह के लंबे संघर्ष के परिणाम में सुप्रीम कोर्ट ने विशाखा जजमेंट पास किया.
इस संघर्ष के बीच बहादुर और संघर्षशील छवि भंवरी देवी की थी. जो राजस्थान के एक गांव में साथिन (एक ग्रामीण कर्मचारी, जो राजस्थान सरकार के महिला विकास कार्यक्रम के अंतर्गत कार्यरत थी), भंवरी देवी का गांव के ही ऊँची जाति के लोगों ने बलात्कार किया था. भंवरी ने बाल विवाह के विरोध में गांव में आवाज़ उठाई थी, इसके लिए उससे बलात्कार किया गया.
उसकी तकलीफ का यहीं अंत नहीं था. जब वह शिकायत दर्ज करने गई तो रात भर महिला पुलिस उसपर ताने कसती रही, उसे मेडिकल की सुविधा नहीं दी गई और सामाजिक रूप से गांव वालों ने उसका बहिष्कार किया. महिला समूहों ने जोरशोर से न्याय के लिए अभियान चलाया. दिसंबर, 1993 में विशाखा बनाम राजस्थान सरकार केस में, राजस्थान हाई कोर्ट ने घोषित किया कि भंवरी देवी का बदले के लिए सामूहिक बलात्कार किया गया था. अंत में महिला समूहों ने सुप्रीम कोर्ट में जन याचिका संहिता दर्ज की.
1997 में विशाखा बनाम राजस्थान सरकार केस पर सुप्रीम कोर्ट का जो जजमेंट आया वो कार्यस्थल पर यौन उत्पीडन के मामलों के लिए महत्वपूर्ण साबित हुआ. न केवल पहली बारे यौन उत्पीडन को परिभाषित किया गया बल्कि मालिक पर यह दायित्व डाला गया कि वह अपने कार्यस्थल पर यौन उत्पीडन के बारे में जागरूकता लाये और शिकायत कमिटी सथापित करे.
तो आपके लिए विशाखा गाइडलाइंस का क्या मतलब है? यह निर्भर करता है कि आप मालिक हैं या यौन उत्पीडन सहने वाली पीड़िता.
किसी भी ऑफिस के लिए विशाखा गाइडलाइंस उपयुक्त है, चाहे वह सरकारी हो या निजी या गैर सरकारी. मालिकों को विशाखा गाइडलाइंस पर ध्यान देना ही होगा और जरुरी कदम उठाने होंगें.
- आप चाहें सरकारी या गैर सरकारी संस्थान में हों, आपके संस्था में निति के तहत यौन उत्पीडन जैसी घटनावों का रोकथाम होना चाहिए. इसकी जानकारी सभी कर्मचारियों को होनी चाहिए जब वे ज्वाइन करते हैं तब और बीच बीच में भी उन्हें याद दिलाना चाहिए. कंपनी को यौन उत्पीडन के मामले को गंभीरता से लेना चाहिए.
- यौन उत्पीडन पॉलिसी के अंतर्गत सारे कर्मचारी आने चाहिए चाहे वे आरोपी हों/पीड़िता एडमिनिस्ट्रेशन से हों, प्रशाशन से हों, अन्य ऑफिसर या बोर्ड के सदस्य. पॉलिसी बनने के लिए आपको जानना जरुरी है कि यौन उत्पीडन क्या है ताकि इसे अपने सभी कर्मचारियों (दोनों मर्दों और औरतों के लिए) तक साधारण भाषा में पहुँचाया जा सके.
- यदि आप सरकारी सेक्टर में हैं तो आपको अपने अनुशाशन और नियमों कायदों में कार्यस्थल पर यौन उत्पीडन को एक गलत नियमों के तहत शामिल करना.
- यदि आप फैक्ट्री के मालिक हैं तो यह बहुत ही महत्वपूर्ण है कि आप पहचाने कि यौन उत्पीडन इंडस्ट्रियल एम्प्लॉयमेंट के स्टैंडिंग कमिटी का हिस्सा है. एक्ट, 1946
- यदि कोई अपराध इन्डियन पिनल कोड के अंतर्गत आता है, यह आपकी ड्यूटी है कि आप इसे पुलिस के पास अलग से रजिस्टर करें.
- इसके आलावा सभी मालिकों को सुरक्षात्मक तरीके अपनाने होंगे, जैसे यौन उत्पीडन पॉलिसी के बारे में जागरूकता फैलाना, मीटिंग में इन मामलों पर बातचीत करना, महिला अधिकारों के बारे में जागरूकता फैलाना.
- यदि मामला दुर्व्यवहार का है तो इसके खिलाफ़ उचित कारवाई करनी चाहिए.
एक अधिकारी के पास शिकायत करने की प्रक्रिया की व्यवस्था होनी चाहिए. औपचारिक और अनौपचारिक तरीके और जरुरी संपर्क डिटेल अपनी जगह पर होना चाहिए. व्यवस्था को चाहिए कि वे महिला कर्मचारियों के भीतर आत्मविश्वास बढ़ायें.
- सभी काम की जगह पर शिकायत प्रक्रिया जरुरी है
- शिकायत कमिटी की प्रमुख महिला होनी चाहिए
- कम से कम 50% महिला मेंबर होनी चाहिये
- इस कमिटी में बाहरी और थर्ड पार्टी होनी चाहिए और वो यदि गैर सरकारी संस्था से हो या जो यौन उत्पीडन के विषय में समझ रखता हो, तो बेहतर है.
- शिकायतकर्ता को यह हक है कि वह शिकायत को गोपनीय रखे. औपचारिक प्रक्रिया करते समय शिकायत कमिटी को यह ध्यान रखना जरुरी है.
- शिकायत कमिटी को समय बद्ध होना चाहिए. बिला वजह सुनवाई में देरी नहीं होनी चाहिए
- किसी भी कार्यस्थल पर सदस्यों को महिला के प्रति संवेदनशील होना चाहिए.
- शिकायत कमिटी को सरकारी विभाग या संस्था संबंधी वार्षिक रिपोर्ट प्रस्तुत करनी चाहिए
- शिकायत कमिटी और मालिक/प्रशासन की बचाव की भूमिका है.
- शिकायतकर्ता और गवाह को गोपनीयता का अधिकार है. औपचारिक प्रक्रिया के दौरान मालिक का इस बात का सम्मान करना जरुरी है.
- मालिक होने के नाते आपकी यह ज़िम्मेदारी है कि आप शिकायत कमिटी सदस्यों की औपचारिक ट्रेनिंग करवाएं. जेंडर के क्षेत्र में दक्ष एक्सपर्ट को यौन उत्पीडन पॉलिसी बनने के लिए बुलाना चाहिए.
- शिकायत कमिटी को स्वतंत्र इकाई की तरह काम करना चाहिए ताकि यह स्वतंत्र रूप से काम कर सके जब मालिक खुद ही यौन उत्पीडन जैसा अपराध करे.
- थर्ड पार्टी यौन उत्पीडन के मामले में शिकायतकर्ता को सहयोग मिलना चाहिए.
- बजट में से कुछ हिस्सा शिकायत कमिटी की ट्रेनिंग, वर्कशॉप और अनौपचारिक चर्चा के लिए अलग से रख लें.
यौन उत्पीडन की शिकार होने या शिकायतकर्ता होने के नाते आपको यौन उत्पीडन की परिभाषा मालूम होना चाहिए और यह भी कि औपचारिक रूप से ऐसे केस को कैसे उठाना चाहिए.
- आपकी ये जिम्मेदारी बनती है कि आप अपने सहकर्मियों को मौजूदा यौन उत्पीडन की पॉलिसी या विशाखा गाइडलाइंस के बारे में बताएं
आप मालिक-कर्मचारी मीटिंग या स्टाफ मीटिंग में यौन उत्पीडन के मुद्दे के बारे में चर्चा कर सकते हैं
आपको अपने मालिक/प्रशासन से यौन उत्पीडन के बारे में सवाल करने का हक है.
बाहर के किसी आदमी/क्लाइंट/थर्ड पार्टी सदस्य द्वारा यौन उत्पीडन होने से आपको यह अधिकार है कि आप अपने मालिक से सहयोग की मांग करें.
विशाखा गाइडलाइंस द्वारा दी गई मालिकों की जिम्मेदारियों के बारे में जानें.
मालिक, प्रशासन और शिकायत कमिटी को आपका और गवाह का बचाव करना चाहिए ताकि आपके यौन उत्पीडन के केस की शिकायत करने के लिए वे बदला लें/डराए धमकाएं या मामले का मजाक बनायें.
क्रिमिनल केस फाइल करना
क्रिमिनल केस फाइल करने का मतलब है कि आप केस को अंत तक ले जाना चाहती हैं. इसका मतलब है ज्यादा समय और पैसा. सबसे पहले एफ आई आर दर्ज करवानी होती है. जैसे कि यह क्रिमिनल केस है, इसमें किसी अन्य द्वारा भी केस दर्ज कराया जा सकता है. उदहारण के लिए शत्रुता भरे माहौल के केस में सामूहिक रूप से जोइंट केस दर्ज कराया जा सकता है. इसके आलावा कार्यस्थल पर यौन उत्पीडन के केसों में मालिक क़ानूनी तौर पर पुलिस में केस दर्ज कराने के लिए बाध्य है.
- यह महत्वपूर्ण है कि आप जाने कि कोग्निजिबल और नॉन-कोग्निजिबल अपराध में क्या फर्क है. नॉन-कोग्निजिबल अपराध (जहाँ पुलिस बगैर वारेंट के आरोपी को गिरफ्तार नहीं कर सकती), उत्पीडन की शिकार महिला को नॉन-कोग्निजिबल रिपोर्ट देनी पड़ती है. इस रिपोर्ट को इसके बाद मजिस्ट्रेट के पास आगे की कार्यवाई के लिए भेजा जाता है.
- इसके बाद पुलिस द्वारा मामले की जांच होती है, जो इस स्तर पर स्टेटमेन्ट रिकॉर्ड करके सबूत इकट्ठा करता है. वे सहकर्मियों, मालिक से सवाल जवाब करते हैं और यदि कोई डोक्युमेंट है तो उसे एकत्रित करते हैं. जांच के आधार पर ही पुलिस तय करती है कि आरोपी को गिरफ्तार किया जाए या नहीं. जांच के बाद, पुलिस चार्ज शीट तैयार करती है जिसे मजिस्ट्रेट को जमा करना होता है.
- इसके बाद केस कोर्ट के प्रस्तुत किया जाता है. फिर आरोपी या तो न्यायिक हिरासत में भेजा जाता है (कोग्निजीबल अपराध के लिए) या पुलिस आगे जांच के लिए परमिशन लेती है (नॉन-कोग्निजिबल अपराध) के लिए.
- कोर्ट द्वारा चार्ज फ्रेम किया जाता है, जहाँ आरोपी को इसके बारे में बताया जाता है और अपना पक्ष (अपराधी है या नहीं) सामने रखने के लिए कहा जाता है.
- दोनों पक्षों के सबूतों और गवाहों को जांचा परखा जाता है.
- दोनों पक्षों द्वारा बहस सामने रखा जाता है.
- अंत में फैसला सुनाया जाता है, और आरोपी को या तो सज़ा दी जाती है या छोड़ दिया जाता है.
सिविल केस फाइल करना
यौन उत्पीडन के केस को सबसे नीचे वाले सिविल कोर्ट में फ़ाइल किया जा सकता है. जहाँ क्रिमिनल कानून का मकसद अपराधी को सज़ा दिलाने का होता है वहीँ सिविल कानून ही केवल एक तरीका है जिसके तहत हर्जाना मिल सकता है. हालांकि, प्रक्रिया जटिल है और यह महत्वपूर्ण है कि आप क़ानूनी सलाह लें.
- सूट केस फ़ाइल करने का पहला कदम है शिकायतकर्ता को तैयार करना. यह एक डीटेल डोक्युमेंट होता है जिसमें प्रार्थी का नाम और पता दर्ज होता है, घटना का डीटेल होता है, याचिका का डीटेल, सूट की कीमत और बहस के लिए सारे जरुरी डोक्यूमेंट होते हैं.
- यदि आपको हर्जाना चाहिए तो घटना के एक साल के अंदर शिकायत दर्ज करना चाहिए.
- एक बार जब सूट फ़ाइल हो जाता है और जज या सम्बंधित अधिकारी द्वारा सुनवाई हो जाती है तो ये प्रार्थी को स्टेटमेंट फ़ाइल करने को कहते हैं. यह लिखित स्टेटमेंट सम्मन जारी होने के एक महीने बाद फ़ाइल होना चाहिए.
- इसके आधार पर दोनों वादी प्रतिवादी को कोर्ट में हाजिर होना होगा, ऐसा न होने पर केस रद्द कर दिया जाएगा. यदि वादी प्रस्तुत नहीं हो पाता तो कोर्ट द्वारा एक्सपर्ट ऑर्डर पास किया जाता है.
- पहली सुनवाई पुछताछ, डोक्युमेंट की जांच और जारी किया गया स्टेटमेंट, अंत में फैसले के घोषित होने के साथ होती है.
- लिखित में शिकायत देने पर केस के दौरान शिकायतकर्ता कमिटी की यह जिम्मेदारी होती है कि आप पर आगे होने वाले उत्पीडन (आरोपी या सहकर्मियों से) बचाव करे.
कोग्निजीबल और नॉन-कोग्निजीबल अपराध
| कग्निजिबल अपराध | नॉन- कग्निजिबल अपराध |
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इन्डियन पिनल कोड के अंतर्गत कानून
हम संछेप में यहाँ इन्डियन पिनल कोड के अंतर्गत कुछ कानून की चर्चा कर रहे हैं. याद रखें यदि आप इन कानूनों का इस्तेमाल करना चाहते हैं तो आपको पहले वकील के पास जाने की जरुरत है.
इन्डियन पिनल कोड 294: अश्लील हरकतें और गाने
कोई भी जो दूसरों को परेशान करता हो:
(a) किसी सार्वजनिक जगह पर अश्लील हरकत करता हो
(b) किसी सार्वजनिक जगह पर अश्लील गाने गाता है, शब्द बोलता है आदि
इन्डियन पिनल कोड 354: किसी महिला का शील भंग करने के लिए उसपर अत्याचार और जबरदस्ती करना
किसी महिला का शील भंग करने के लिए उसपर अत्याचार और जबरदस्ती करना या वह ऐसा करेगा इसकी जानकारी होना. [कोग्निजीबल और जमानती]
इन्डियन पिनल कोड 509: शील भंग करने के लिए शब्द, हावभाव या हरकत करना
किसी महिला की शीलता को अश्लील भाषा, टिप्पणी, आवाज़ या हावभाव या कोई वस्तु दिखाकर भंग करना या उसकी प्राइवेसी का उलंघन करना. [कोग्निजीबल और जमानती]
इन्डियन पिनल कोड 503: क्रिमिनल घमकी
जो कोई भी किसी को उसे चोट पहुँचाने, उसके मान सम्मान को चोट पहुँचाने या संपत्ति को नुकसान पहुँचाने की धमकी देता है, या फिर उस आदमी के पहचान वाली किसी को ऐसी ही धमकी देता है या किसी को गैर क़ानूनी काम करने की धमकी देता है तो यह सारी हरकतें क्रिमिनल धमकी कहलाती हैं.
इन्डियन पिनल कोड सेक्शन 354 का इस्तेमाल तभी होता है जब उत्पीडक महिला का शील भंग करने के इरादे से उसपर जोर जबरदस्ती करता है
- यह सेक्शन 509 से ज्यादा गंभीर है जिसमे ज्यादा कड़ी सज़ा, दो साल या जुर्माना या दोनों, का प्रावधान है.
- हरकत का चरित्र यौनिक होना चाहिए. इसके आलावा, इसमें मौखिक उत्पीडन जैसे सिटी मारना, अश्लील छींटाकशी करना, गाने गाना आदि शामिल नहीं है.
- इस सेक्शन के अंतर्गत सारे शारीरिक यौनिक उत्पीडन आते हैं जैसे घूरना, उत्पीडन और यौनिक उत्पीडन. कोई भी हरकत जिससे महिला की प्राइवेसी का उलंघन होता है, जैसे उसके फोन पर परेशान करने वाला सन्देश भेजना, या उसकी गैरहाजिरी में उसकी चीजों की छानबीन करना या महिला को परेशान करने के लिए उसके कपड़ों को हाथ लगाना, इस सेक्शन के अंतर्गत आता है. कोई भी हरकत जो महिला को परेशान करने और डराने के लिए किया जाए इस सेक्शन के अंतर्गत आएगा.
इंडियन पिनल कोड 509 में शामिल है वे सारे अश्लील शब्द, हावभाव या हरकत जो यौनिक चरित्र के हैं. जो किसी महिला के शील को भंग करने या उसकी प्राइवेसी का उलंघन करने के लिए किया जाए.
- इस सेक्शन के अंतर्गत साधारण एक साल तक कारावास या जुर्माना या दोनों हो सकती है.
- हरकत का चरित्र यौनिक होना चाहिए. इस सेक्शन में शारीरिक उत्पीडन शामिल नहीं है.
- सेक्शन 509 में अश्लील टिप्पणी करना, गाने गाना, सिटी मारना, अश्लील हावभाव बनाना, किसी महिला का पीछा करना, गंदे पत्र और ईमेल भेजना, डराने धमकाने जैसी हरकत करना, शामिल है. साथ ऐसी कोई हरकत करना जिससे सार्वजनिक जगहों पर महिला के आने जाने में दिक्कत हो.
- इस सेक्शन के अंतर्गत जिसके साथ यौन उत्पीडन हुआ है उस महिला को यह साबित करना होगा कि उत्पीडक ने उसके शील को भंग करने का प्रयास किया है. यह उत्पीडित के हावभाव और हरकतों से साबित होता है.
शीलता क्या है?
“….किसी महिला की शीलता का उलंघन हुआ है कि नहीं इसे जांचने का यही तरीका है कि देखा जाए कि क्या इस हरकत से महिला की चरित्र का हनन हुआ है.”
– सुप्रीम कोर्ट का बजाज बनाम के.पी.एस गिल केस में बयान (1995) 6 एससीसी 194
इन्डियन पिनल कोड में ‘मोडेस्टी’ यानि ‘शीलता’ सबसे ज्यादा विवाद का विषय है. एप्रेल एक्सपोर्ट बनाम ए.के.चोपड़ा केस में सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय में यौन उत्पीडन को परिभाषित किया था “ कोई भी हरकत या हावभाव, प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से महिला सहकर्मी की शीलता का उलंघन करे.” यह दोनों सेक्शन 354 और 509 के लिए लागू होता है. ओनलाईन मेर्रियम-वेबस्टर के मुताबिक इसका मतलब है, ‘कपड़े पहनने, बोली और व्यवहार में शीलता’. यह विरोधाभास ही साबित करता है जैसे कि अक्सर शिकायतकर्ता की शीलता उसके व्यवहार और स्वभाव पर निर्भर करता है. इसके आलावा, शिकायतकर्ता के पास शीलता होनी चाहिए जिसका उलंघन किया गया हो. हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने बजाज बनाम के.पी.एस. गिल केस में सकारात्मक निर्णय दिया है.
इंडियन पिनल कोड 294 अश्लीलता के लिए क्लॉज है जिसमें शामिल है सार्वजनिक जगह पर अश्लील हरकत करना और जिससे आसपास लोगों को इससे परेशानी हो.
- इसकी सज़ा तीन महीने तक की हो सकती है या जुर्माना या फिर दोनों.
- इस सेक्शन में कार्यस्थल पर पोर्नोग्राफिक ईमेल भेजना, अश्लील चुटकुले सुनना, अश्लील टिप्पणी करना, अश्लील गाने गाना, सार्वजनिक जगहों पर अश्लील आवाज़ और हावभाव जैसे अपराध शामिल हैं.
- यह जानने के लिए कि हरकत इस सेक्शन के अंतर्गत आता है कि नहीं यह देखना जरुरी है कि उसकी हरकत जैसे कि गाना/शारीरिक हावभाव/शब्द सार्वजनिक जगहों पर उत्पीडक को परेशान कर रहे हैं या नहीं. जैसा कि यह मानसिक तनाव का मामला बन जाता है इसलिए इसे साबित करना जरुरी है,
इंडियन पिनल कोड का सेक्शन 503 बहुत ही अहम एक्ट है क्योंकि यह कार्यस्थल पर यौन उत्पीडन और जिन महिलाओं को उनके पुराने साथी पीछा करके उत्पीडित करते हैं, उसके लिए इस्तेमाल होता है.
- किसी को यौन उत्पीडन की धमकी देना या किसी महिला में गंभीर अपराध का डर बैठा देना जैसे अपराध इस सेक्शन के अंतर्गत आते हैं. उदाहरण के लिए, जब कोई मालिक/सुपरवाइजर/स्टाकर (पीछा करने वाला) सीधे तौर पर यौन संपर्क की मांग नहीं करता मगर उसकी तरफ इशारा करता है. या जब कोई महिला अपने पुराने पार्टनर या बिल्कुल अंजान व्यक्ति से डरती है. इससे महिला की प्राइवेसी, उसकी सम्पति और उसकी प्रतिष्ठा को नुकसान का डर भी होता है.
- कोई भी डराने धमकाने वाली हरकत जो किसी महिला को जोर जबरदस्ती करे कि वह ऐसा काम करे जो इस सेक्शन के अन्तर्गत गैर क़ानूनी है. उदाहरण के लिए, जब किसी महिला को डराया जाये जब वह ‘डेट’ के लिए ना जाए.
- सेक्शन 503 में वो सभी हरकत शामिल होते हैं जो महिला को जोर जबरदस्ती कर उसे वो सब नहीं करने देता जो वह क़ानूनी रूप से कर सकती है. उदाहरण के लिए, जब किसी महिला को डराया धमकाया जाता है जब वह यौन उत्पीडन की औपचारिक शिकायत दर्ज करना चाहती है या अन्य कोई निर्णय लेना चाहती है.
महिला को उनुचित रूप से प्रदर्शित करना, एक्ट (1987) सेक्शन 294 के साथ साथ, अश्लीलता के मुद्दे पर, या किसी पठान सामग्री में जैसे विज्ञापन में अनुचित रूप से महिला के प्रदर्शन पर लागू होता है.
- आई आर डब्ल्यू ए का सेक्शन 7 खासतौर पर कार्यस्थल पर यौन उत्पीडन के सन्दर्भ में उपयोगी है. उदाहरण के लिए, जहाँ महिलाओं को कार्यस्थल पर आपत्तिजनक पोर्नोग्राफिक सामग्रियों में और सन्देश में इस्तेमाल किया जाता है.
- इसके आलावा, यदि यह साबित हो जाए कि इस तरह की पॉर्न सामग्री सुपरवाइजर या डाइरेक्टर की अनुमति या उनकी लापरवाही की वजह से तैयार हुई है तो उन्हें क़ानूनी सज़ा हो सकती है.
- इस एक्ट के तहत दो साल तक सज़ा या जुर्माना या दोनों हो सकता है.
स्टाकिंग (पीछा करना) के लिए कानून
स्टाकिंग के लिए इस्तेमाल होने वाले भारतीय कानूनों के बारे में जानना आवश्यक है. यहाँ अलग से स्टाकिंग के लिए कोई कानून नहीं है. स्टाकिंग के केस निम्नलिखित सेक्शनों के अंतर्गत आ सकते हैं.
इंडियन पिनल कोड का सेक्शन 294: अश्लील गाने और हरकतें
कोई भी जो किसी अन्य को परेशान करे:
(a)किसी सार्वजनिक जगह पर अश्लील हरकत करे
(b) किसी सार्वजनिक जगह या उसके पास अश्लील गाने गए, उच्चारित करे या शब्द बोले.
इंडियन पिनल कोड का सेक्शन 354: किसी महिला का शील भंग करने के लिए उसपर अत्याचार करना या आपराधिक जोर जबरदस्ती करना.
किसी महिला का शील भंग करने के लिए उसपर अत्याचार और जबरदस्ती करना या वह ऐसा करेगा इसकी जानकारी होना. [कोग्निजीबल और जमानती]
इन्डियन पिनल कोड 509: शील भंग करने के लिए शब्द, हावभाव या हरकत करना
किसी महिला की शीलता को अश्लील भाषा, छींटाकशी, आवाज़ या हावभाव या कोई वस्तु दिखाकर भंग करना या उसकी प्राइवेसी का उलंघन करना. [कोग्निजीबल और जमानती]
इन्डियन पिनल कोड 503: क्रिमिनल घमकी
जो कोई भी किसी को उसे चोट पहुँचाने, उसके मान सम्मान को चोट पहुँचाने या संपत्ति को नुकसान पहुँचाने की धमकी देता है, या फिर उस आदमी के पहचान वाली किसी को ऐसी ही धमकी देता है या किसी को गैर क़ानूनी काम करने की धमकी देता है तो यह सारी हरकतें क्रिमिनल धमकी कहलाती हैं.
सेक्शन 66, आईटी एक्ट,2000: कम्पूटर सिस्टम की हैकिंग करना
जो कोई भी किसी सरकारी या निजी कम्पूटर में दर्ज जानकारी को गलत मंशा से मिटाता या नुकसान पहुंचाता है, हैकिंग कहलाता है.
सेक्शन 67, आईटी एक्ट, 2000: एलेक्ट्रॉनिक रूप में मौजूद अश्लील जानकारी को प्रदर्शित करना.
जो कोई भी एलेक्ट्रॉनिक रूप में कोई भी सामग्री जो अश्लील हो या उत्तेजक हो जिसका पढ़ने,देखने,सुनने वाले पर गलत असर हो, उसको खराब करे, गुमराह करे तो ऐसी सामग्री प्रदर्शित करने वाले को कारावास की सज़ा हो सकती है जो पांच साल तक हो सकती है. इसके लिए जुर्माना एक लाख रुपया हो सकता है और यदि अपराध दोबारा साबित हो जाए तो सज़ा दस साल और जुर्माना दो लाख रूपये तक हो सकता है.
सेक्शन 66, आईटी एक्ट,2000
- सेक्शन 66 में शामिल है, साईबर क्राइम और साईबर स्टाकिंग जैसे आपके ईमेल आईडी, पासवर्ड, ऑनलाईन बैंक एकाउंट, प्रोफाइल आदि की जानकारी को चुराना (हैक करना).
- मुंबई के साईबर सेल के मुताबिक, हैकिंग का मतलब है बिना मालिक या इस्तेमाल करने वाले की जानकारी और इजाज़त के बिना कम्पूटर सिस्टम में गैर क़ानूनी रूप से हस्तक्षेप करना. हैकिंग से स्टाकर को किसी के व्यक्तिगत जानकारी के बारे में बड़े पैमाने पर जानकारी मिल जाती है, जो वह उस महिला को डराने धमकाने के लिए इस्तेमाल कर सकता है. आपके व्यक्तिगत जानकारी को पॉर्न वेबसाईट पर या डेटिंग सर्विस देने वाली साईट पर देना साईबर स्टाकर के आम अपराध हैं.
- स्टाकर आपकी ऑनलाईन पहचान को लेकर अन्य लोगों को भी परेशान कर सकता है.
- इसकी सज़ा पांच साल तक और जुर्माना 5 लाख रुपये तक हो सकता है.
- यदि आप इस अपराध का शिकार होती हैं तो आपको जरुरी डोक्यूमेंट जैसे ईमेल, बैंक ट्रांजक्शन का विवरण आदि रखना चाहिए. ईमेल आईडी या ऑनलाइन प्रोफाइल जो हैक हुआ है उसे ना मिटाएं, जैसा कि यह महत्वपूर्ण सबूत होता है.
सेक्शन 67, आईटी एक्ट, 2000
- सेक्शन 67 ऑनलाईन पोर्नोग्राफिक और अन्य अश्लील सामग्रियों से सम्बंधित साईबर स्टाकिंग के मामलों को शामिल करता है. ऑनलाइन पर ऐसी कोई भी सामग्री जो कि अश्लील हो उसे कोई प्रकाशित करता है तो उसे इस सेक्शन के अंतर्गत सज़ा हो सकती है.
- इसकी सज़ा 5 साल और जुर्माना 5 लाख रुपया हो सकता है.
- हो सकता है कि स्टाकर (पीछा करने वाला) आपके फोटोग्राफ का गलत इस्तेमाल कर उसे पॉर्न वेबसाइट पर प्रकाशित कर दे.
- सबूत के लिए अच्छा रहेगा कि आप इन वेब पेजों की फोटो खिंच कर रखें.


