कॉलेज
“ यदि मुझे एक टीचर होने के नाते व्यवस्था के साथ लड़ना होगा जिससे बहुत कम सहयोग की उम्मीद है तो एक छात्रा मदद के लिए कहाँ जायेगी? उत्पीडन जो महिला छात्रा अपने टीचर द्वारा सहती हैं वह बहुत ज्यादा और छुपे तौर पे है.” इंग्लिश प्रोफ़ेसर, लखनऊ विश्वविद्यालय, [ नवंबर 2003, इंडिया टुगेदर]
हम ज्यादातर कॉलेज की जिंदगी को आज़ादी और मस्ती से जोड़कर देखते हैं. हालांकि, किसी और के कीमत पर किसी की मस्ती एक बुरे सपने में बदल जाती है. कॉलेज में होने वाला यौन उत्पीडन ऐसा ही एक खतरा है.
आपके सवाल
कॉलेज में होने वाले यौन उत्पीडन का क्या मतलब है?
कॉलेज में होने वाले यौन उत्पीडन से मतलब है छात्रों के बीच होने वाला अनचाहा शारीरिक और मौखिक यौन संपर्क. ‘कॉलेज’ शब्द में केवल जहाँ क्लासेस होती हैं सिर्फ वही जगह नहीं है बल्कि इसमें सार्वजनिक जगह, रिहायशी जगह जैसे होटल, स्टाफ के रहने की जगह, अन्य संस्थान और प्रशाशिनिक जगह आदि शामिल है.
याद रखें कि ज़रुरी शब्द यहाँ अनचाहा है. यह कई स्तर पर हो सकता है और इसका असर कई रूपों में हो सकता है: छात्रों के बीच, छात्र और स्टाफ के बीच, स्टाफ के बीच, स्टाफ और प्रिंसिपल के बीच, प्रिंसिपल और छात्रों के बीच या छात्रों और कॉलेज में आने वाले विसिटर्स के बीच. प्रत्येक संबंध का अपना ही सन्दर्भ, आंकड़ा और सत्ता का रूप होता है. यह एक बार होने वाली घटना हो सकती या लगातार होने वाला वाकया. यह या तो केवल एक पुरुष द्वारा या फिर पुरुषों के समूह द्वारा हो सकता है.
सुप्रीम कोर्ट द्वारा 1997 में विशाखा गाइडलाइंस आने के बाद निजी हो या सार्वजनिक सभी कॉलेजों में यौन उत्पीडन के खिलाफ़ सुनवाई की व्यवस्था अनिवार्य कर दी गई है. मालिक (निजी हो या राज्य के अंतर्गत) की यह संविधानिक ड्यूटी है कि वह सुरक्षित शिक्षा और कार्यस्थल (काम की जगह या पढ़ने की) मुहैया कराये.
यह क्या रूप ले सकता है?
यौन उत्पीडन कई तरह के रूप ले सकता है मौखिक और मानसिक से लेकर शारीरिक तक.
“ यौन उत्पीडन इतना गुप्त होता है कि इसके बारे में शिकायत तभी बाहर आती है जब इसे बर्दाश्त करना असहनीय हो जाता है. जैसे कि राजस्थान सेवा संघ कॉलेज के छ स्टाफ का मामला.” – एक वकील, [ टाइम्स ऑफ इंडिया, 29/02/2004]
प्राथमिक रूप से ये दो प्रकार के होते हैं: क्विद प्रो को और शत्रुता पूर्वक काम का माहौल
क्विद प्रो को में शामिल है यौनिक संबंध के लिए पूछना/निवेदन करना/मांग करना और बदले में मार्क्स बढ़ाने, प्रमोशन देने आदि की शर्त रखना. यहाँ यदि पीड़िता अपनी सहमति देती है फिर भी यह यौन उत्पीडन ही कहलायेगा क्योंकि यह दबाव में आ कर दी गई सहमति है. क्विद प्रो को सीधा और स्पष्ट होता जो आसानी से समझ आता है.
शत्रुता पूर्वक काम का माहौल, यौन उत्पीडन का वह रूप है जो कॉलेज के माहौल को महिला छात्रों, महिला टीचरों और अन्य लोगों के लिए असुरक्षित बनाता है. यह अस्पष्ट और बड़े पैमाने पर छिपा होता है.
नीचे दिए गए इस तरह के यौन उत्पीडन के कुछ उदाहरण दिए गए हैं:
- गैर मौखिक यौनिक हरकतें जैसे शरीर के हिस्सों को घूरना, आपको छूते हुए या ढकेलते हुए निकल जाना, बिना वजह गले लगाना और अश्लील भाव भंगिमा बनाना
- मौखिक टिपण्णी करना जैसे अश्लील छींटाकशी, गाने और चुटकुले सुनाना, आपसे यौनिक संबंध की मांग करना और आपके चरित्र के बारे में झूठी अफवाहें उड़ाना.
- आपके मना करने के बावजूद आपको उसके साथ बाहर जाने के लिए जोर देना
- आपकी इच्छा के विरूद्ध आपको अश्लील सामग्रियां दिखाना, सन्देश भेजना और चित्र दिखाना
- शारीरिक उत्पीडन जैसे घेरना, छूना, लोगों के सामने चुम्बन लेना और गले लगाना
- आपको ज़बरदस्ती शराब पिलाना, सिगरेट पिलाना या ड्रग्स खिलाना
- घर जाते समय आपका पीछा करना और आपके बारे में झूठी अफवाह फैलाना. वह ईमेल, चिठ्ठी, फोन एसेमेस और फोन से भी आपका पीछा कर सकता है.
- टीचर का प्रिंसिपल द्वारा छुट्टी की मंजूरी के लिए उत्पीडन करना (यह क्विद प्रो को है)
- लड़कियों के लिए टोइलेट्स और मेडिकल सुविधा ना होना
- आप महिला हैं इसलिए बार बार आपके काम में कमियां निकालना
- लड़की को परीक्षा में पास करने के लिए उससे यौनिक संबंध की मांग करना (यह क्विद प्रो को है)
- आपकी यौनिक पहचान को लेकर (प्राइवेट में या सार्वजनिक में) मजाक बनाना
लेकिन क्या सचमुच यह इतना गंभीर है?
यह मजाक हो सकता है मगर यह गंभीर भी हो सकता है और इसका गहरा असर हो सकता है.
“…कुछ साधारण भावनाएं जैसे भ्रमित होना, ताकतहीन, विश्वास टूटना, खुद के आत्म विश्वास को सवाल करना, गन्दा महसूस होना, शर्म, कमजोर, भयभीत, बुरा लगना, गुस्सा आना, शक होना, भरोसा ना होना, चोट लगना और खराब महसूस करना से लेकर कुछ गंभीर मानसिक प्रतिक्रियाएं हो सकती हैं.” – मनोचिकित्सक, सागर अपोलो हॉस्पिटल, [द डेक्कन हेराल्ड, 21-06-2008]
यौन उत्पीडन अपराध है फिर भी अक्सर इसे गैर हानिकारक और नार्मल मान लिया जाता है. यौन उत्पीडन नार्मल इस सन्दर्भ में हो सकता है कि यह बहुत कॉमन है मगर इस सन्दर्भ में बिल्कुल नहीं कि यह ठीक है!
लोगों की साधारण सोच से उल्टा महिलाएं अनचाहा यौनिक संबंध पसंद नहीं करती हैं और ना ही यौनिक व्यवहार के लिए उकसाती हैं. यह पुरुषवादी सोच है कि महिलाएं जानबूझकर उत्पीडन को बुलाती हैं और इस बात को महिलाओं ने भी मान लिया है. पीड़िता को उसके कपड़ों को लेकर, उसके बाहर आने-जाने की आज़ादी को लेकर दोषी ठहराना पुरुषों के बहाने हैं जो अक्सर मर्द औरत दोनों ही इस्तेमाल करते हैं.
यदि यह इतना ही गंभीर है तो महिलाएं इसकी रिपोर्ट क्यों नहीं करतीं?
यहाँ कई कारण है जिसके चलते महिलाएं यौन उत्पीडन के बारे में रिपोर्ट नहीं करती हैं!
“मुझे हमेशा कहा जाता है कि मुझे ऐसे लोफरों को जो गंदे अश्लील चुटकुले सुनते हैं उन्हें नज़रंदाज़ करना चाहिए. कभी कभी मेरे हाथ उन्हें झापड़ मारने को मचलने लगते हैं मगर मैं इसके परिणाम से डर जाती हूँ.”
“यदि मैं शिकायत भी करती हूँ तो कौन मेरे बात को सीरियसली लेगा?”
“लोग मेरा मजाक बनायेंगे”
“किसी को कुछ कहने की ज़रूरत ही क्या है? मेरे पिता मुझे कॉलेज जाने से रोक देंगें.”
“मुझे नहीं पता कि कॉलेज के कोई शिकायत समिति है. पहली बार मैंने इसके बारे में सुना है.”
“लड़के तो छेड़ते ही हैं, यह उनके स्वभाव का हिस्सा है. तुम इसके लिए क्या कर सकती हो?”
“मैं जिन लोगों के साथ काम करती हूँ मुझे उनके साथ मिलजुल कर रहना होगा. यौन उत्पीडन के चार्ज लगाने का कोई मतलब नहीं है यदि आप कोई फ़िल्मी सितारे या राजनीतिज्ञ ना हों.”
रिपोर्ट करने के बाद ज्यादा उत्पीडन होने के खतरे, खुद को ही दोषी ठहराए जाने का डर, मजाक बनाये जाने का डर और कमजोर व्यवस्था होना भी कारण हैं जिनकी वजह से ज्यादा मामलों के केस ही नहीं दर्ज कराये जाते.
कॉलेज में होने वाले यौन उत्पीडन और रैगिंग क्या एक ही हैं?
“मौखिक हिंसा और किसी लड़की को छू कर निकल जाना ऐसा उत्पीडन है जो ज्यादा से ज्यादा लड़कियों को झेलना पड़ता है. यह अपने सीनियर्स को जानने से शुरू होता है मगर पहले साल के बाद भी चलता रहता है. इसे रैगिंग कहना मुश्किल हो जाता है जैसे कि इसमें धमकी शामिल नहीं होती है.” एक इंजीनीयरिंग छात्र, [डाटाक्वेस्ट, 15-11-2007]
हाँ और ना भी. नए और पुराने छात्रों के बीच रैगिंग सीनियर्स छात्रों के साथ शुरूआती जानपहचान का है. इस प्रक्रिया में नए छात्रों को पुराने छात्र कुछ काम देते हैं, जिसे करने से नए छात्र उनके समूह में शामिल होते हैं. यहाँ भारत में कई सारे रैगिंग के केस हुए हैं जिसमें छात्रों की या तो जान चली गई है या वर्षों की पढ़ाई. रैगिंग के दौरान दिया गया काम यदि बुरा लगने वाला, ज़बरदस्ती और खतरनाक हो तो रैगिंग घिनौने यौनिक, शारीरिक और मानसिक हिंसा में बदल जाता है.
दूसरी तरफ, यौनिक उत्पीडन आपकी जेंडर (ज्यादातर औरतों के साथ) पहचान की वजह से होता है. रैगिंग में दोनों लड़का और लड़की को टारगेट बनाया जाता है. रैगिंग और यौन उत्पीडन दोनों ही मामले सज़ा के अंतर्गत आते हैं. इसके आलावा, लंबे समय तक चलने वाला रैगिंग और यौन उत्पीडन का मामला एक ही पैकज के अंदर आ सकता है. हालांकि बहुत से कॉलेजों में रैगिंग बैन (प्रतिबंधित) है, मगर फिर भी यह बहुत कॉमन है.
क्या यह ईव टीजिंग जैसा ही है?
हाँ! ईव-टीजिंग का मतलब होता है हल्का फुल्का बोला और अनबोला उत्पीडन, जैसे कि घूरना, छींटाकशी करना आदि जिसे नार्मल, मस्ती और न नुकसान देने वाला माना जाता है.
इसके अलावा, इसका यह भी मतलब है कि महिलाएं ही अपनी हरकतों से टीजिंग के मामलो को बढ़ावा देती हैं. इसका मतलब है कि महिला ने ही अपनी सामाजिक मर्यादा को लांघा है और उसे इसकी सज़ा मिलनी चाहिए. हालांकि ईव टीजिंग और यौन उत्पीडन एक ही तरह का व्यवहार है, हलके फुल्के व्यवहार के अंदर ही यह सच छुपा होता है कि यौन उत्पीडन एक अपराध है, और वह भी गैर-जमानती और कोग्निजीबल जब वह सेक्शन 509 के अंतर्गत आता है.
क्या यौनिक उत्पीडन फ्लर्ट करने से अलग है?
फ्लर्टिंग दो लोगों के बीच आपसी सहमति से होता है. जबकि यौन उत्पीडन एक तरफ़ा और ज्यादातर पुरुषों द्वारा होता है जो महिला छात्र और सह कर्मचारियों पर करते हैं. दोनों में खास फर्क इतना ही है कि एक आपसी सहमति और इच्छित होता दूसरा अनचाहा और ज़बरदस्ती का.
कॉलेज में कहाँ यौन उत्पीडन होता है?
कॉलेज में यौन उत्पीडन कॉलेज के बरामदे, मैदान, एकांत जगह, कॉलेज गेट के बाहर, कार पार्किंग की जगह, कैंटीन, क्लास के अंदर और बाहर, स्टाफ रूम और सीढियों पर हो सकता है.
यह नोट करें कि यौन उत्पीडन का केस युनिवर्सिटी के न्यायिक क्षेत्र में पड़ता है जब यह उन दो लोगों के बीच होता है जो कॉलेज में मिले हों, लेकिन वास्तविक यौन उत्पीडन की घटना कॉलेज के बाहर और काम के समय के बाद हुई हो. यह सभी पर लागू होता है चाहे छात्र हो, टीचर हों या नॉन टीचिंग स्टाफ.
उदाहरण के लिए, यदि किसी लेक्चरार का प्रिंसिपल कॉलेज के बाहर और काम के समय के बाद उत्पीडन करता है तो फिर भी यह कॉलेज के डिसिप्लिन के अंतर्गत ही आएगा. ‘कॉलेज’ में अन्य जगहें भी शामिल हैं जैसे होस्टल, खेलने का मैदान, स्टाफ के रहने की जगह, हेल्थ सेंटर्स, कैंटीन और सार्वजनिक जगहें जैसे पार्क्स, गली और अन्य.
इसके आलावा भी यौन उत्पीडन का केस युनिवर्सिटी के न्यायिक क्षेत्र में पड़ेगा यदि उत्पीडन की घटना फिल्ड ट्रिप में, कोंफ्रेंस में, खेल कार्यक्रम और कॉलेज फेस्टिवल्स में हुई हो.
संभावित कदम
“पहले तो, हमें यह समझने की ज़रूरत है कि हिंसा के बाद पीड़ित पूरी तरह से खामोश नहीं रहती…औपचारिक शिकायत के पहले पीड़िता अपने दोस्तों या रिश्तेदारों से बताती है. उसके बाद शायद औपचारिक लोगों से कहती है जैसे सहकर्मी और अधिकारी से.” [द हिंदू 29/09/2002]
इसके बारे में बात करना और इसे यौन उत्पीडन का नाम देना पहला महत्वपूर्ण कदम है. इससे इसका सामना करने में आत्मविश्वास आता है.
अनौपचारिक रणनीतियां
“ज्यादातर छात्र शिकायत दर्ज करवाकर पीछे हट जाते हैं, जबकि अन्य आपस में ही निपटा लेना ठीक समझते हैं.” टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेस लेक्चरर, [टाइम्स ऑफ इंडिया, 8/08/2002]
अनौपचारिक रणनीतियाँ वे हैं जो आपकी निजी सुरक्षा से सरोकार रखती हैं. ये रणनीतियाँ दरसल उत्पीडक से सामना करने के उपाय हैं जो आपके निजी सुरक्षा का भी ध्यान रखती हैं. आपका उद्देश्य होना चाहिए कि आगे आपके साथ कोई हिंसा न हो.
इस स्तर पर, हम आपके साथ वे रणनीतियाँ बाँटेंगे जो आपको यौन उत्पीडन से सामना करने में आपके आत्मविश्वास को बढ़ाने में मदद करेगी और साथ ही आप अपनी रणनीतियाँ भी बना सकेंगीं. जैसे ही उत्पीडन हो उसी समय अपनी आवाज़ उठाना सबसे महत्वपूर्ण है. इससे उत्पीडक को यह सन्देश मिलता है कि आपके साथ यौन उत्पीडन करना आसान नहीं है. इसके आलावा, हम आपकी मदद करते हैं कि आप इसके खिलाफ़ औपचारिक कदम उठाने में खुद की तैयारी कर सकें.
उत्पीडक का सामना करना
बोलने से न केवल आप अपने ऊपर हो रहे उत्पीडन को रोकती हैं बल्कि इससे उत्पीडक दोबारा किसी के साथ ऐसी हरकत करने से पहले सोचेगा.
आपके ऊपर हो रही यौन उत्पीडन को रोकने की मांग आप अधिकार है! भले ही उत्पीडक साथ पढ़ने वाला साथी हो, टीचर, दोस्त का दोस्त, कोई पहचान वाला, सफाई कर्मचारी, नॉन-टीचिंग स्टाफ, लाइब्रेरियन, खेल कोआर्डिनेटर, लैब असिस्टेंट या प्रसाशन अधिकारी या अन्य. यौन उत्पीडन उस समय और भी गंभीर हो जाता है जब कोई लेक्चरर, हेड ऑफ द डिपार्टमेंट या प्रिंसिपल करता है. याद रखें, किसी भी तरह का क्विद प्रो को उत्पीडन इंडियन पिनल कोड के तहत अपराध है और मानव अधिकार का हनन है.
जब आपके साथ यौन उत्पीडन हो तो इसके खिलाफ़ बोलें. यदि उत्पीडक आपसे ऊँचे दर्जे पर हो तो आप मजबूत बनी रहें. यदि वह आपका दोस्त है तो खुलकर कहें. आत्मविश्वास के साथ बोलें. उत्पीडक तुरंत उत्पीडन बंद करे इसकी मांग करें!
‘क्या करें’ और ‘क्या ना क्या करें’ के बारे में पढ़ें
क्या करें
- जब आप प्रतिरोध करें तो सीधे बात करें. स्पष्ट रूप से कहें कि उसने क्या किया और कैसे आपके लिए ये बर्दाश्त करने लायक नहीं है. आपकी आवाज़ में स्थिरता, मजबूती रहे. ज़रूरत हो तो अभ्यास करें, “ मुझे बहुत आपत्तिजनक लगा जिस तरह से (………..) उस दिन (………..) किया और मैं कहती हूँ कि इसे तुरंत बंद करो. औरतों के साथ यौन उत्पीडन बंद करो.” यदि उत्पीडक अजनबी हो तो उसे उसी तरह जवाब दें, “तुम इसे…….बंद करो. यह यौन उत्पीडन है. औरतों का उत्पीडन बंद करो.
- उसे बताएं कि उसका बर्ताव आपत्तिजनक है और यह यौन उत्पीडन है. यह खासतौर पर उत्पीडक को उसकी हरकत बताने लिए कहना चाहिए. उदाहरण के लिए जब आपके पुरुष दोस्त कोई आपत्तिजनक चुटकुला सुनाएँ और आपको महिला होने के नाते आपत्ति है तो उन्हें टोकें.
- आप उसे बताएं कि आप चुप नहीं रहेंगी. यौन उत्पीडन के खिलाफ़ बोलना आपका सिद्धांत है. इसका यह भी मतलब है कि आप खुद का इतना सम्मान करती हैं और अपना बचाव कर सकती हैं.
- यदि ज़रूरत हो तो उसके हरकत को सबके सामने लायें.
- आप यह समझें कि मज़ा-मस्ती/फ्लर्ट करना/दोस्त बनाना वैसा ही नहीं है जैसे यौन उत्पीडन. ये दोनों अलग हैं
- उत्पीडक को यह बताएं कि यौन उत्पीडन एक अपराध है और वह इसके लिए वह जेल भी जा सकता है!
- अपने टोन को गंभीर रखें. यौन उत्पीडन बंद हो इसके लिए आपका इरादा पक्का हो.
- सामना करते समय अपने शारीरिक भाव को कंट्रोल में रखें. मजबूत बने रहें और सीधे उसकी आँखों में देखें. बात करते समय सीधी खड़ी रहें और अपनी आवाज़ स्थिर रखें.
- याद रखें, हंसी मजाक कर पाने की कला का यौन उत्पीडन से कुछ लेना देना नहीं है. उत्पीडक को बताएं कि आपकी कीमत पर वह मजा करे तो यह मुमकिन नहीं है.
- उसके बुरे बर्ताव पर ही बात को केंद्रित रखें.
- याद रखें, यदि पहले उसके साथ आपका संबंध भी क्यों न रहा हो, अब आपके साथ किसी तरह की ज़बरदस्ती करने का अधिकार उसे नहीं है. खासतौर से जब आप ना चाहती हों.
- याद रखें, यह आपका अधिकार है कि आप बातचीत खत्म करें. आपको उससे लगातार बहस करने की या कोई स्पष्टीकरण देने की ज़रूरत नहीं है. यदि वह बहस करता है तो, बीच में ही उसे टोक कर बातचीत खत करें.
क्या ना करें
- जोर से हसें नहीं, ना ही मुस्कुराएँ, रोयें या बात करते समय लडखडायें
- उस पर न चिल्लाएं और ना ही सामान फेंकें. उससे बात करते समय अपना आप ना खोएं.
- उत्पीडक का सामना करते हुए कमजोर आवाज़ और डरे हुए अंदाज़ में बात ना करें.
- उत्पीडन के लिए कोई बहाना ना दें. और ना ही उसका बचाव करें. यदि आपको उसके बर्ताव से चोट लगी हो या आपत्ति हो, तो कहें. उसके बुरे बर्ताव को यह मान कर ना टालें कि आपमें उसकी दिलचस्पी है या उसका स्वभाव ही ऐसा है या वह इस बारे में कुछ नहीं कर सकता. जो हुआ है उसे नकारे नहीं.
- उसके बहाने और बहस को ना सुने. यदि ज़रूरत हो तो उसे टोकें.
- यदि ज़रूरत हो तो शारीरिक रूप से प्रतिक्रिया देने में ना झिझकें.
- किसी भी सूरत में उत्पीडक के किये गए बर्ताव के लिए खुद को दोषी ना मानें.
- बहुत देर तक मामले को लटकाए ना रखें. जल्दी और सटीक बात करें.
- उत्पीडक के बारे में कोई भी जानकारी नज़रंदाज़ ना करें.
- यह ना सोचें कि यौन उत्पीडन झेलने वाली आप अकेली हैं. और भी कई लोग हो सकते हैं जो इस अनुभव से गुज़र रहे हैं.
उत्पीडन को डोक्युमेंट करना
एक नोट बनाकर रखें कि कब (तारीख, दिन और समय), कहाँ और किसके द्वारा आपके ऊपर उत्पीडन हुआ है. नोट करें कि घटना कैसे हुई और उत्पीडक की पहचान क्या थी. आपको क़ानूनी कार्यवाई करने के लिए ये जानकारी महत्वपूर्ण है. यदि आप लगातार उत्पीडन का शिकार हो रही हैं तो नोट में दर्ज करें कि घटना के वक्त आपको कैसा महसूस हुआ और आपने कैसे जवाब दिया.
बाँटना (शेयरिंग)
विरोध करने का मकसद सिर्फ उत्पीडक से सामना ही करने का नहीं है बल्कि घटना को सबके सामने लेन का भी है. जिस घडी आप घटना को अपने परिवार/दोस्तों/सहकर्मियों के साथ बाँटती हैं तो फिर यह निजी मुद्दा नहीं रह जाता.
हम समझते हैं कि आप डरी होती हैं, लेकिन जब आप बाँटती हैं हो उत्पीडक के इस भ्रम को तोडती हैं कि आप खामोश रहेंगीं. याद रखें, महिला हिंसा के खिलाफ़ कोई भी मामला चाहे वो यौन उत्पीडन हो या घरेलु हिंसा यह आपका निजी मामला नहीं है. यह सामाजिक मामला है, एक अपराध है.
अपने स्तर के ही लोगों से बाँटने का मतलब है कि आप गवाह तैयार कर रही हैं. वे इस बात के भी गवाह हैं कि घटना का आप पर किस तरह का असर हुआ है. उस समय यह भी हो सकता है कि आप अन्य महिलाओं को भी इसका शिकार पायें. आपके बात करने से अन्य महिलाएं भी ऐसी घटनाओं के लिये सतर्क हो जायेंगीं.
व्यक्तिगत सुरक्षा
“ आप मुझे ऐसे बॉस दिखाएँ जिनकी नज़रें और हाथ आप पर नहीं चलते, मैं आपको दस ऐसे दिखा सकती हूँ……उसने मेरा डिप्लोमा कोर्स करना नामुमकिन कर दिया था.” दिल्ली युनिवर्सिटी की एक लेक्चरर जिसका हेड ऑफ द डिपार्टमेंट ने यौन उत्पीडन किया था. [द हिंदू, 20-2-2000]
एक ही यौन उत्पीडन का अनुभव छात्रों की सुरक्षा की भावना को भंग कर सकती है जो वे अपने क्लास रूम में महसूस करती हैं. यह बहुत ही पीड़ादायक अनुभव है. सुरक्षा के भाव को तैयार करना ज़रुरी है.
जब आपका यौन उत्पीडन होता है, इसे ठीक होने में काफी समय लगता है. मगर ना केवल पीड़िता की सुरक्षा के लिए ही बल्कि आगे होने वाले यौन उत्पीडन से बचाव के लिए भी एक सुरक्षा नेट होना ज़रुरी है. कॉलेज के अंदर किस तरह से निजी सुरक्षा को सुनिश्चित करें इसके बारे में पढ़ें.
- आपका सबसे पहला मकसद होना चाहिए कि खतरे की स्थिति से खुद को दूर रखें.
- आपको चाकू या मिर्ची पाउडर साथ रखने कि ज़रूरत नहीं है. उसके बदले छोटी वस्तुएं जैसे पेन, डीओ, सेफ्टी पिन, हेयर पिन, चाभी, किताबें, छाता, बैग, कोहिनी आदि आपके हथियार हो सकते हैं.
- यदि आप ऐसी स्थिति में फंस जाती हैं जहाँ उत्पीडक हिंसक है, तो देखें यदि आप मीठी मीठी बातों/ झूठे वादे करके उससे बच निकल पाती हैं.
- जैसे ही कोई आपका उत्पीडन करने की कोशिश करे उसे आप तुरंत जवाब दें. ज्यादातर उत्पीडक यह उम्मीद नहीं करते कि आप विरोध करेंगी या बोलेंगीं. वह तभी निशाना बनाता है जब उसे लगता है कि आप उससे डरती हैं या अपनी बात रखने में शर्मायेंगी.
- जब उत्पीडक अंजान होता है तो उसे जवाब देना आसान होता है, जब हम उत्पीडक को जानते हैं तो भ्रमित हो जाते हैं. जो कोई भी हो, आप यह बात याद रखें कि यह यौन उत्पीडन है और एक अपराध है.
- जब आपको आपत्ति हो आप उसी समय टोकें. इतना भर ही उत्पीडक का हौसला तोड़ सकता है जैसे कि उसने सोचा नहीं होगा कि आप बोल पड़ेंगीं.
- इमरजेंसी नंबर हमेशा अपने साथ रखें. आपने फोन में स्पीड डायल में सेव करके रखें ताकि ज़रूरत पड़ने पर इस्तेमाल कर सकें और गवाह भी तैयार कर सकें.
- जब आपके साथ यौन उत्पीडन हुआ हो तो अपने भरोसेमंद दोस्तों को इसकी जानकारी दें.
- जिससे आप नहीं बताना चाहती उससे कुछ कहने की ज़रूरत नहीं हैं. अपनी निजी जानकारी उन लोगों को देने की ज़रूरत नहीं है.
- यह चुनना आपका अधिकार है कि आप किसके साथ बाहर जाएँ. जिसके साथ नहीं जाना उसे ‘ना’ कहने का आपको हक है.
- आपको जब ज़रूरत हो तो मदद की मांग करें.
- जब कोई अधिकारी आपके साथ गलत बर्ताव करे तो इसे अन्य लोगों के साथ बांटें.
आपना दायरा तय करना
“मुझे उतनी ही आपत्ति हुई जितना कि लिफ्टमैन मुझे घूर रहा था और मेरे साथ का छात्र जो कि देखने में अमीर लगता है.” वकील, [विमेंस फ़ीचर सर्विस, 23/05/2009]
हर इंसान का अपना निजी और सुविधाजनक दायरा होता है. इस दायरे का मतलब है कि उस इंसान के लिए किसी भी व्यक्ति का कौन सा व्यवहार स्वीकार करने के लिए है और कौन सा नहीं.
व्यक्ति व्यक्ति के लिए ये दायरा फर्क होता है, उनको बर्दाश्त करने का स्तर, उनसे नजदीकी, उनका जेंडर, सन्दर्भ और स्थिति. अपनी दोस्ती में, निजी रिश्ते में और काम के रिश्ते में यह दायरा बनाना बहुत ज़रुरी है. कुछ हद तक हम इसे गंभीरता से नहीं लेते फिर हमारे दायरे को जब कोई लांघता है तो हम शाक्ड (अवाक्) हो जाते हैं. उदाहरण के लिए एक लेक्चरर छात्रों को बिला वजह गले लगता है, छूता है तो उन्हें बहुत अटपटा और खराब लगता है. यह उनके दायरे का उलंघन है जो उन्होंने अपने लिए तय किया है.
इन दायरों का केवल शारीरिक रूप से ही उलंघन नहीं होता, बल्कि मौखिक भी हो सकता है, जैसे निजी सवाल करके या कुछ खास तरह के आपसे सवाल करके. आपस के दोस्तों में ये दायरे हलके होते हैं. सबसे महत्वपूर्ण है कि हम किसे इन दायरों के अंदर आने देते हैं और किससे दूरी बनाकर रखते हैं.
अपने दायरे को तय करने में महत्वपूर्ण बात है कि ‘ना’ कहना जब इसका कोई उलंघन करता हैं. इस मामले में आपको ईमानदार, सपाट और बोलने वाला होना चाहिए. आप इस प्रक्रिया में हो सकता है कि किसी के इगो को चोट पहुंचाएं मगर यहाँ खुद की सुरक्षा ज्यादा ज़रुरी है.
अर्ध-औपचारिक रणनीतियाँ
“ शिक्षा के क्षेत्र और सरकारी दफ्तरों में आश्चर्यजनक रूप से उत्पीडन बहुत ज्यादा है. हमारे पास कॉलेज से कुछ केसों की शिकायते आई कि वहाँ पुरुष टीचर्स महिला टीचर्स पर अश्लील टिप्पणियाँ करते हैं और उनसे यौनिक संपर्कों की मांग करते हैं.” जाग्रति महिला संगम की एक कार्यकर्ता, द हिंदू, 27/08/05
अर्ध-औपचारिक रणनीतियाँ वे हैं जो पूरी तरह से औपचारिक तरीकों के पहले आती हैं. आप शिकायत करते हैं (लेकिन लिखित रूप में नहीं), ना केवल उत्पीडक को, बल्कि लेक्चरर को, यूनियन और छात्र समूहों को, प्रिन्सिपल या शिकायत समिति को.
तथ्य खोज की प्रक्रिया
इस स्तर पर आ कर आप जितनी जानकारियां एकत्रित कर सकते हैं करें. इससे ना केवल आपको किसी ठोस निर्णय पर पहुँचाने में ही मदद मिलेगी बल्कि आप उनलोगों की सहायता भी कर सकते हैं जो ख़ामोशी में इससे पीड़ित होते रहते हैं.
तथ्य खोज की प्रक्रिया की चेक लिस्ट
- क्या आपके कॉलेज में शिकायत या यौन उत्पीडन सेल है? यदि नहीं, तो सुनवाई और सहायता के लिए विकल्प क्या है?
- औपचारिक शिकायत दर्ज करने के लिए आपको क्या करने की ज़रूरत है?
- क्या लेक्चरर को यह अधिकार है कि वो इस मामले में आपकी मदद कर सकें?
- यदि आप खुद एक लेक्चरर हैं और आपके सहकर्मी या प्रिन्सिपल ने आपका उत्पीडन किया है तो क्या आप समिति के पास जा सकते हैं?
- आपका केस पुलिस के पास जाने लायक कितना मजबूत है? वकील से चेक करें
- क्या सेल या समिति आपके ऊपर आगे होने वाले उत्पीडन से बचाव करेगी?
- क्या इस प्रक्रिया की आपको कोई कीमत चुकानी होगी?
- क्या आप पूरी प्रक्रिया को गोपनीय रख सकते हैं? किस हद तक?
- शिकायत दर्ज करने से लेकर उत्पीडक को सज़ा दिलाने तक कितना समय लगेगा?
लेक्चरर/हेड ऑफ डिपार्टमेंट/प्रिन्सिपल से शेयर (बाँटना) करना
“सुबह 11 बजे मुझे दूसरे छात्र के साथ जाना था, लेकिन मैं ऐसा कर नहीं पाई, मैं उससे शाम 5 बजे मिली. तबतक, अधिकतर टीचर्स जा चुके थे. प्रिंसिपल जानबूझकर मुझपर चिल्लाये और मेरे मातापिता को बता देने की धमकी दी. मगर जब मैं रोने लगी तो वो मेरे पास मुझे चुप कराने आया…और फिर मेरे स्तन को छूने लगा” 19 वर्षीय कामर्स की छात्र, जिसे उसके टीचर्स ने सांत्वना देकर कॉलेज में पढते रहने के लिए समझाया. [डीएनए, 02/12/2007]
लेक्चरर ना केवल महत्वपूर्ण सहायता के स्त्रोत हैं बल्कि यदि आपके साथ यौन उत्पीडन हुआ है तो वे आपको गाइड भी कर सकते हैं. मामला और गंभीर हो जाता है जब उत्पीडक खुद ही एक लेक्चरर हो. इन केसों में आपको खासतौर पर अनौपचारिक रूप से किसी भरोसेमंद टीचिंग स्टाफ सदस्य या समिति सदस्य जैसे राष्ट्रीय सोशल सर्विस को बताना चाहिए.
गवाह तैयार करना
सबसे ज्यादा यौन उत्पीडन की घटनाएँ तब घटती हैं जब आपको जबरन कहीं अकेला किया जाता हैं या किसी बंद परिवेश में रखा जाता है. खुद की मदद करने का एक तरीका है कि यौन उत्पीडन होने की घटना का एक गवाह तैयार किया जाये. इसका मतलब है कि आप अपना अनुभव किसी खास व्यक्ति के साथ बांटें. यह व्यक्ति समिति या कोर्ट के सामने स्टेटमेंट देने को तैयार रहे.
अनौपचारिक बात चीत
हालांकि, आपको यौन उत्पीडन समिति के पास औपचारिक शिकायत दर्ज करवाना चाहिए मगर साथ ही किसी सदस्य से अनौपचारिक बातचीत करना भी अच्छा रहेगा. इससे आपको यह जानने में मदद मिलेगी कि औपचारिक शिकायत करने से आपको इससे क्या उम्मीदें हैं और इसका परिणाम क्या होगा. इसके अलावा इससे आपको औपचारिक शिकायत दर्ज करने के अपने विकल्पों को परखने में भी मदद मिलेगी.
यूनियन से बात करना
“ हमने जीएसकैश नाम की एक बॉडी बनाई (यौन उत्पीडन के खिलाफ़ जेंडर संवेदनशीलता समिति) जिसमे छात्र, टीचर्स और शिक्षक प्रतिनिधित्व के साथ वार्डेन भी शामिल हैं. यह समिति यौन उत्पीडन के मामलों की रिपोर्ट करती है, मोनिटर और जांच करती है. जबसे यह समिति बनी है चालीस केस फाइल हो चुके हैं और पांच व्यक्तियों को कड़ी सज़ा मिल चुकी जिनमें से एक फैकल्टी मेंबर है. प्रशासन उसके खिलाफ़ कारवाई करने को राज़ी नहीं था मगर जब हमने बड़े पैमाने पर स्ट्राइक किया तो उसके खिलाफ़ कार्यवाई हुई.” जोइंट सेक्रेटरी ऑफ द स्टुडेंट्स यूनियन, जवाहरलाल नेहरु युनिवर्सिटी, दिल्ली [नवंबर 2003. इण्डिया टूगेदर]
यदि आप यौन उत्पीडन का शिकार हुई हैं तो स्टुडेंट्स यूनियन से मदद लेना बढ़िया रास्ता है. आपके अकेले केस लड़ने से बेहतर है कि केस के पिछे किसी समूह का साथ हो इससे ज्याद स्कोप होता है कि आपकी बात सुनी जाये और केस अंत तक पहुंचे. इसके अलावा यूनियन समिति के काम और कॉलेज में यौन उत्पीडन की रोकथाम के लिए जागरूकता फैलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है.
औपचारिक तरीके
औपचारिक तरीके वे हैं जिनमें आप यौन उत्पीडन के मामले को लिखित रूप में संस्था के प्रमुख/प्रिंसिपल/यौन उत्पीडन समिति तक ले जाती हैं. इस स्तर पर, आप यह भी तय कर सकती हैं कि केस को पुलिस तक ले जाएँ. याद रखें, यौन उत्पीडन कोग्निजिबल जुर्म है और गैर-ज़मानती है.
“यौन उत्पीडन समिति क्या है?”
“हम अनहोनी होने का इंतज़ार नहीं करते, हम छात्रों के बीच जागरूकता लाते हैं.” चेयरपर्सन, यौन उत्पीडन समिति, युनिवर्सिटी ऑफ हेदराबाद [द हिंदू, 02/03/2009]
- सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुसार सभी मालिकों को यह निर्देश है कि वे यौन उत्पीडन के मामलों को देखने के लिए यौन उत्पीडन समिति का गठन करें. इसीके परिणाम स्वरुप यह सेल, यौन उत्पीडन से बचाव और ऐसे केसों की सुनवाई, इसके बारे में जागरूकता, गाइडलाइंस उपलब्ध कराना और कॉलेज स्तर पर यौन उत्पीडन समिति का गठन आदि करती है.
- यौन उत्पीडन सेल का ढांचा एस युनिवर्सिटी से दूसरे का अलग है. उदाहरण के लिए मुम्बई में कॉलेज यौन उत्पीडन समिति और युनिवर्सिटी यौन उत्पीडन समिति है, वहीँ दिल्ली युनिवर्सिटी में तीन टाएर ढांचा है: व्यक्तिगत कॉलेज स्तर पर सेल, युनिवर्सिटी डिपार्टमेंट के क्लस्टर स्तर पर सेल, उनके संस्थानों के लिए सेल जो ऊपर दो तरह की श्रेणी में नहीं आते, और फिर पूरी दिल्ली युनिवर्सिटी के लिए अपेक्स शिकायत समिति.
- शिकायत समिति में पांच सदस्य की टीम होती है, जिसमें 50% महिलाएं होंगीं, थर्ड पार्टी सदस्य के रूप में एक एनजीओ सदस्य होगा और एक सदस्य रिजर्वड श्रेणी से.
- यौन उत्पीडन के अपराधी को देने वाली सज़ा उसके दर्जे के हिसाब से होगी. यदी आरोपी छात्र है तो सज़ा चेतावनी, लिखित माफ़ी, कुछ समय के लिए निलंबित या परीक्षा में बैठने ना देना. यदि उत्पीडक कर्मचारी है तो सज़ा चेतावनी से लेकर प्रमोशन रोकने और सर्विस से निकल देने और जबरन रिटायेरमेंट तक हो सकता है.
“यौन उत्पीडन कमिटी को मैं कैसे संपर्क करूँ?”
“कोई भी महिला कर्मचारी, छात्र, लेक्चरर या नॉन-टीचिंग स्टाफ हो उसे होने वाले यौन उत्पीडन के मामले पर खामोश नहीं रहना चाहिए. यौन उत्पीडन कोग्निजीबल अपराध है और यहाँ आपकी मदद के लिए यौन उत्पीडन समिति है. हमारे ऊपर अपना विश्वास रखें और केस को अंत तक ले जाएँ. आपका छोटा कदम लंबे समय तक यौन उत्पीडन को रोकने में मदद्कारी हो सकता है.” चेयरपर्सन, यू डब्लू डी सी, मुंबई युनिवर्सिटी
- अधिकतर केसों में शिकायतकर्ता द्वारा ही शिकायत दर्ज करना चाहिए. जिसका उत्पीडन हुआ है उसकी सहमति के बिना औपचारिक शिकायत दर्ज नहीं हो सकता.
- शिकायत लिखित में होना चाहिए और उसपर शिकायतकर्ता का हस्ताक्षर होना चाहिए. आप मौखिक रूप से शिकायत दर्ज करने का भी चुनाव कर सकते हैं, मगर इसे यौन उत्पीडन कमिटी के सदस्य द्वारा फिर लिखित में दिया जायेगा. जबतक आप इसे साइन नहीं करतीं तबतक इसे औपचारिक शिकायत नहीं माना जायेगा. यह डाक्यूमेंट शिकायत रजिस्टर में जाता है जो कि गोपनीय है.
- आप पूरी गोपनीयता के साथ शिकायत दर्ज कर सकती हैं. यह खासतौर पर महत्वपूर्ण है जब आपको लगता है कि कहीं बात पब्लिक ना हो जाए.
- इसके बाद शिकायतकर्ता की बात पांच सदस्य वाले शिकायत कमिटी द्वारा सुनी जाती है और यह निर्णय लिया जाता है कि क्या केस यौन उत्पीडन के अंतर्गत आता है. इसके बाद एक इंक्वायरी रिपोर्ट तैयार की जाती है. और यदि केस को बंद करना हो तो उसके ठोस कारण दिए जाते हैं.
- यदि यौन उत्पीडन कमिटी केस लेने का निर्णय लेती है, तब आरोपी को उसके ऊपर होने वाली इंक्वायरी की खबर दी जाती है. उसे दी गई समय अवधि में अगली मीटिंग/सुनवाई में प्रस्तुत होना होता है. हालांकि यह समय अवधि एक से दूसरी युनिवर्सिटी में फर्क हो सकती हैं.
- इस स्तर पर आकार आपको तय करना है कि आप केस को आगे कैसे ले जायेंगीं. इसका मतलब है कि आप उत्पीडक को केवल चेतावनी देना चाहती हैं या आप चाहती हैं कि कमिटी उसके खिलाफ़ कोई कड़ी कारवाई करे, जैसे कि ट्रान्सफर.
- यौन उत्पीडन कमिटी ही इस बात का निर्णय लेती हैं कि सज़ा की डीग्री क्या होगी जो कई बातों पर निर्भर होती है जैसे मामले की संगीन इंक्वायरी पर, उत्पीडन कितनी बार किया गया उसपर, शिकायतकर्ता पर और संस्थान पर पड़ने वाले असर पर और दोनों के दर्जे के आधार पर. जैसे किसी छात्र का अन्य छात्र द्वारा कमेंट मरने से टीचिंग स्टाफ के सदस्य द्वारा पीछा करना ज्यादा संगीन मामला है.
“मेरे कॉलेज में यौन उत्पीडन कमिटी नहीं है. मैं क्या करूँ?”
या “ मेरे कॉलेज में यौन उत्पीडन कमिटी सालों से निष्क्रिय है. फिर मैं किसके पास जाऊं?”
अक्षरा नाम की महिला सन्दर्भ सेंटर द्वारा किये गए एक अध्यन के अनुसार मुंबई युनिवर्सिटी के 45 कॉलेजों में से आधे कॉलेजों में यौन उत्पीडन कमिटी या तो निष्क्रिय है या थोडा काम कर रही है. इसकी बहुत ज्यादा संभावना हो सकती है कि आप अपने कॉलेज में जांच और सुनवाई का औपचारिक सिस्टम ना पायें. एक छात्र होने के नाते, जिसके साथ अन्य छात्र ने या बाहर के किसी व्यक्ति ने यौन उत्पीडन किया हो, कुछ ही उपाय हैं.
- अन्य विशिष्ट बॉडी को सम्बर्क करें जैसे यौन उत्पीडन के खिलाफ़ जेंडर सवेदनशीलता कमिटी, जवाहरलाल नेहरु युनिवर्सिटी या यौन उत्पीडन के खिलाफ़ फोरम, दिल्ली आधारित.
- डिपार्टमेंट हेड/प्रिंसिपल/अन्य लेक्चरर
- अपने साथियों से मदद लें और सहायता के लिए जोइंट शिकायत दें
- यदि वहाँ यूनियन है तो उसे संपर्क करें
- कॉलेज में सुनवाई के प्रावधान हों इसके लिए लॉबी करें
- अपनी शिकायत लेकर युनिवर्सिटी स्तर के यौन उत्पीडन कमिटी के पास जाएँ.
जब कोई लेक्चरर अपने सहकर्मी/प्रिंसिपल/नॉन-टीचिंग स्टाफ द्वारा और एक छात्र लेक्चरर/प्रिंसिपल/नॉन-टीचिंग स्टाफ द्वारा यौन उत्पीडन का शिकार होता है और आपके कॉलेज में शिकायत सेल भी नहीं है, यह बहुत ही गंभीर मसला है क्योंकि यहाँ अधिकारी शामिल है. आपको नीचे दिए गए विकल्पों में से एक तो चुनना ही चाहिए.
- युनिवर्सिटी स्तर पर यौन उत्पीडन कमिटी से संपर्क करें
- पुलिस के पास जाएँ
- अन्य सहकर्मियों से सहयोग लें
- प्रशासन/कार्यकारिणी बॉडी के सदस्य/बोर्ड ऑफ ट्रस्टी से संपर्क करें
- कॉलेज के स्तर पर यौन उत्पीडन कमिटी बनाने के लिए अन्य सहकर्मियों से मिलकर लॉबी करें
“मेरे शिकायत पत्र/फॉर्म में क्या होना चाहिए”
- आपके औपचारिक शिकायत पत्र में शिकायत की तारीख, आपका नाम और दर्जा (आप जिस डिपार्टमेंट की है). इसमें स्पष्ट लिखा होना चाहिए कि यौन उत्पीडन की घटना कब हुई, उत्पीडक की पहचान क्या थी, उसका दर्जा और डिपार्टमेंट, और किस परिस्थिति में यौन उत्पीडन की घटना हुई थी. यह भी दर्ज करें कि घटना का आपके ऊपर क्या असर हुआ और आपने क्या प्रतिक्रिया दी.
- पत्र औपचरिक तरह का होना चाहिए और भावनात्मक नहीं होना चाहिए
- यौन उत्पीडन के मुद्दे को ही केन्द्र में रखें. आपको उत्पीडक के स्वभाव का विवरण देने की ज़रूरत नहीं है, केवल घटना पर ही फोकस रखें.
- यदि उत्पीडन एक से ज्यादा बार हुआ है तो सभी घटना की तारीख, स्थान, किस तरह से आपका उत्पीडन हुआ और सन्दर्भ क्या था
- आप जिस सदमें से गुज़रीं उसका बयान कीजिये.
- यदि आप अपने केस की गोपनीयता बनाये रखना चाहती हैं तो उसका उल्लेख करें.
- यदि आप उत्पीडक के खिलाफ़ औपचारिक/क़ानूनी कदम लेना चाहती हैं तो इसे लिखें.
“क्या पुलिस के पास जाना अच्छा उपाय है?”
हाँ! यदि आपको लगता है कि कॉलेज के पास आपकी शिकायत को देखने के लिए पर्याप्त व्यवस्था नहीं है, तब आपको पुलिस के पास जाना चाहिए और एफ आई आर दर्ज करवानी चाहिए!
अधिकतर युनिवर्सिटी और कॉलेज के अंदर या आसपास पुलिस स्टेशन होता है. कहीं कहीं पर तो मोबाईल पुलिस स्टेशन होते हैं जो कई कॉलेजों में काम करते हैं. कई लोग पुलिस के पास जाने से झिझकते हैं, सोचते हैं कि इससे मामला और उलझ जायेगा. मगर याद रखें, विरोध ना करने से आप आरोपी को आज़ाद जाने देती हैं.
क्रिमिनल प्रावधान के बारे में और जानने के लिए, कि एफ आई आर कैसे दर्ज होता है, होम में जहाँ इंडियन पिनल कोड के तहत सेक्शन जो यौन उत्पीडन के लिए है और जहाँ यौन उत्पीडन पर अन्य कानून दिए गए हैं, वहाँ पर पुलिस के पास जाएँ सेक्शन में जाएँ


